विदेशी मुद्रा व्यापारी पाठ्यक्रम

विदेशी मुद्रा में 6 नौकरियां

विदेशी मुद्रा में 6 नौकरियां

सूचना का अधिकार अधिनियम 2005

भारत सरकार ने सूचना की स्वतंत्रता अधिनियम की जगह ‘सूचना का अधिकार अधिनियम 2005’ अधिनियमित किया है। किसी भी सार्वजनिक प्राधिकरण के कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा देने के लिए, यह अधिनियम नागरिकों को सामान्य प्रकृति की सूचना प्राप्त करने का अधिकार प्रदान करता है। इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक “सार्वजनिक प्राधिकरण” हैं।

अधिनियम के तहत उपलब्ध सूचना

जहां तक ​​बैंकों का संबंध है, संबंधित प्रावधान यथा धारा 4(1), 5(1) और 5(2) पहले ही लागू हो चुके हैं। सूचना के अधिकार के तहत उस सूचना को प्राप्त किया जा सकता है जो सार्वजनिक प्राधिकरण के रूप में बैंक के पास या उसके नियंत्रण में है तथा इसमें कार्य, दस्तावेज, अभिलेखों का निरीक्षण करने, टिप्पणियों, दस्तावेजों/अभिलेखों के उद्धरणों या प्रमाणित प्रतियों और तथ्यों के प्रमाणित नमूने लेने तथा इलेक्ट्रॉनिक रूप में भी संग्रहीत सूचना को प्राप्त करने का अधिकार शामिल है।

सूचना के प्रकट किए जाने से छूट

अधिनियम के धारा 8 और 9 के तहत कुछ निश्चित श्रेणियों की सूचना को नागरिकों को प्रकट किए जाने से छूट प्राप्त है। सूचना के लिए आवेदन पत्र प्रस्तुत करने से पहले जनता अधिनियम के संबंधित खंडों का भी संदर्भ ग्रहण करें।

सूचना कैसे प्राप्त करें?

कोई भी नागरिक लिखित रूप में या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से प्रधान कार्यालय, इंडियन बैंक, नंबर 66, राजाजी सालै, चेन्नै – 600 001 में पदस्थ लोक सूचना अधिकारी (पीआईओ) को आवेदन पत्र प्रस्तुत करके सूचना के लिए अनुरोध कर सकता है। इसे बैंक की किसी शाखा/अंचल कार्यालय में भी जमा किया जा सकता है।

नागरिक https://rtionline.gov.in लिंक का उपयोग कर ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से भी आवेदन कर सकते हैं। इस प्रक्रिया में आरटीआई शुल्क का ऑनलाइन भुगतान किया जा सकता है और आवेदन जमा करने पर आवेदनकर्ता को पंजीकरण संख्या मिलती है जिससे वह आवेदन को ट्रैक कर सकता है।

आवेदन का निपटान आरटीआई अधिनियम की धारा 7 के अनुसार किया जाएगा।

1 अप्रैल 2020 से इलाहाबाद बैंक के इंडियन बैंक में समामेलन होने पर बैंक का प्रतिनिधित्व, व्यवसाय और ग्राहकों का विस्तार देश भर में हो गया। बैंक ने चार स्तरीय संगठनात्मक व्यवस्था को अपनाया है जिसमें सिंगापुर और श्रीलंका में स्थित 3 विदेशी शाखाओं के अलावा कॉर्पोरेट कार्यालय, 14 क्षेत्रीय महाप्रबंधक कार्यालय, 78 अंचल कार्यालय और पूरे देश में फैले 5754 शाखाएं (31.12.2021 तक) शामिल हैं।

यथास्थिति 31.12.2021 को इक्विटी पूंजी का 79.86% भारत सरकार की थी और शेष 20.14% आम जनता की थी।

बैंक की गतिविधियां बैंकिंग विनियमन अधिनियम और समय-समय पर जारी आरबीआई के निर्देशों के अनुरूप संचालित की जाती हैं।

शाखाओं का लोकेशन और पता जानने के लिए => शाखा नेटवर्क पर क्लिक करें

इसके अलावा बैंक पूरे देश में फैले एटीएम के माध्यम से 24×7 बैंकिंग सेवा प्रदान करता है। एटीएम का लोकेशन और पता जानने के लिए एटीएम नेटवर्क पर क्लिक करें।

बैंक की 3 विदेशी शाखाएं हैं – एक सिंगापुर में, विवरण के लिए सिंगापुर पर क्लिक करें और 2 श्रीलंका में है। विवरण के लिए कोलंबो और जाफना पर क्लिक करें।

बैंक की दो सहायक कंपनियां हैं: 1. इंडबैंक मर्चेंट बैंकिंग सर्विसेज लिमिटेड, विवरण के लिए इंडबैंक मर्चेंट बैंकिंग सर्विसेज लिमिटेड पर क्लिक विदेशी मुद्रा में 6 नौकरियां करें।

2. इंडबैंक हाउसिंग लिमिटेड

बैंक ने अपने ग्राहकों के लिए गैर-जीवन बीमा उत्पादों के विपणन के लिए यूनिवर्सल सोम्पो जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के साथ एक संयुक्त उद्यम भी कर रहा है।

हालांकि, जमा, ऋण और अन्य उत्पादों, योजना दिशानिर्देशों, पात्रता आदि के बारे में कुछ जानकारी नीचे दिए गए लिंक पर उपलब्ध हैं।

जमाएँ ऋण अन्य गतिविधियां
बचत बैंक खाता कृषि वित्तीय समावेशन
चालू खाता निजी/व्यक्तिगत सेवा शुल्क
मियादी जमाएँ एमएसएमई बीमा सेवाएं
एनआरआई खाते शिक्षा म्यूचुअल फंड
जमा दर कॉर्पोरेट नीतियाँ
ऋण दर निविदाएं / नीलामी
लेखा परीक्षक
करियर
विप्रेषण
शिकायत

केंद्र और राज्य सरकार के प्रायोजन विभाग ऐसे कार्यक्रमों के लाभार्थियों को सूचीबद्ध करते हैं और परिचालन से संबंधित क्षेत्र में बैंकों में आवंटित करते हैं। सब्सिडी केंद्र और राज्य सरकार के संबंधित प्रायोजन विभागों द्वारा प्रबंधित की जाती है।

जनता को दिये जानेवाले बैंक के विभिन्न ऋण उत्पाद हैं। विवरण के लिए ऋण मेन्यू का चयन करें।

बचत बैंक जमा के लिए स्टाफ/पात्र सेवानिवृत्त स्टाफ सदस्यों को 1.00% प्रति वर्ष का अतिरिक्त ब्याज प्रदान किया जाता है।

वरिष्ठ नागरिकों के लिए ₹10 करोड़ तक की राशि तक की घरेलू सावधि जमा के लिए देय अतिरिक्त ब्याज दर 0.50% प्रति वर्ष होगी। अल्पावधि जमा, सावधि जमा और धन गुणक जमा योजनाओं के संबंध में कार्ड दर से 7 दिन से 10 वर्ष तक की जमा राशि पर अतिरिक्त दर प्रदान की जाएगी। इसी प्रकार, आवर्ती जमा खातों के लिए अतिरिक्त ब्याज दर 6 महीने से 120 महीने (3 महीने के गुणक में) की अवधि के लिए पात्र होगी। उपरोक्त उच्चतम सीमा एक या एक से अधिक शाखाओं में प्रधान खाता धारक के रूप में वरिष्ठ नागरिक के नाम पर जमा सभी प्रकार की सावधि जमाओं पर लागू होती है। तथापि, एकल सीआईएफ के अंतर्गत ₹10 करोड़ की समग्र सीमा के भीतर एक दिन में ₹2 करोड़ से अधिक के लिए कोई एकल जमा खाता नहीं खोला जा सकता है।

पूंजीगत लाभ योजना टाइप बी (सावधि जमा) 1988 योजना के तहत खोले गए वरिष्ठ नागरिकों की जमा खाता इस लाभ के लिए पात्र नहीं है। इसी प्रकार एचयूएफ के नाम पर सावधि जमा के मामले में एचयूएफ का कर्ता उच्च ब्याज दर के लिए पात्र नहीं है, भले ही वह एक वरिष्ठ नागरिक हो, क्योंकि जमा का लाभार्थी स्वामी एचयूएफ है, न कि व्यक्तिगत रूप से एचयूएफ का कर्ता।

आरटीआई के तहत प्राप्त आवेदन और प्रदान की गई सूचना का विवरण:

प्राप्त और निपटाए गए आरटीआई आवेदनों का विवरण:

वर्ष प्राप्त आरटीआई आवेदन आरटीआई आवेदनों का निपटान
2020-21 4851 4686
2021-22 4725 4788

प्राप्त अपीलों और जारी आदेश का विवरण:

वर्ष प्राप्त अपील आवेदन अपीलों का निपटान
2020-21 800 768
2021-22 871 883

सीपीआईओ/एपीआईओ का प्रशिक्षण

सार्वजनिक सूचना: शिकायतों का निवारण आरटीआई अधिनियम के दायरे से बाहर है।

सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 4(2) के अनुसार, बैंक ने निम्नलिखित सूचना का प्रकटीकरण किया: विवरण के लिए लिंक पर क्लिक करें।

गिरते रुपये को थामने को लेकर RBI के संपर्क में है वित्त मंत्रालय, विदेशी मुद्रा भंडार घटकर हुआ 400.10 अरब डॉलर

डॉलर के मुकाबले लगातार गिरते रुपये को थामने के लिये बाजार हस्तक्षेप को लेकर वित्त मंत्रालय बराबर रिजर्व बैंक के साथ संपर्क बनाये हुए है. अमेरिकी डॉलर की तुलना में रुपया 72.45 रुपये प्रति डॉलर के निचले स्तर तक गिर चुका है.

By: एबीपी न्यूज़/एजेंसी | Updated at : 11 Sep 2018 08:55 AM (IST)

नई दिल्ली: एक अधिकारी ने जानकारी दी कि अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगातार गिरते रुपये को थामने के लिये बाजार हस्तक्षेप को लेकर वित्त मंत्रालय बराबर रिजर्व बैंक के साथ संपर्क बनाये हुए है. अमेरिकी डॉलर की तुलना में रुपया 72.45 रुपये प्रति डॉलर के निचले स्तर तक गिर चुका है. भारतीय रिजर्व बैंक गिरते रुपये को थामने के लिए बाजार में लगातार डॉलर बेच रहा है, यही वजह है कि देश का विदेशी मुद्रा भंडार जो कि अप्रैल में 426 अरब डॉलर पर था अगस्त अंत तक गिरता हुआ 400.10 अरब डॉलर रह गया.

अधिकारी का कहना है कि रिजर्व बैंक के पास विदेशी मुद्रा का पर्याप्त भंडार है. वित्त मंत्रालय इस मामले में सही समय पर बाजार हस्तक्षेप के लिये केन्द्रीय बैंक के साथ संपर्क बनाए हुए है. हालांकि, अधिकारी ने कहा कि रुपये में गिरावट चौतरफा नहीं है. भारतीय मुद्रा ब्रिटेन के पौंड, यूरो, चीन युआन और जापानी येन की तुलना में मजबूत हुई है.

अधिकारी ने कहा कि सरकार के पास विदेशी मुद्रा जुटाने के लिये प्रवासी भारतीयों को बॉन्ड जारी करने का विकल्प मौजूद है लेकिन इस बारे में जरूरी विचार विमर्श के बाद ही कोई फैसला किया जायेगा.

अधिकारी ने कहा, ‘‘फिलहाल घबराहट वाली कोई बात नहीं है क्योंकि ज्यादातर वैश्विक मुद्रायें डॉलर की मजबूती से प्रभावित हुई हैं. बल्कि, यहां तो रुपया कई अन्य मुद्राओं के मुकाबले मजबूत हुआ है.’’

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चालू खाते का घाटा यानी कैड अप्रैल से जून तिमाही के दौरान जीडीपी के समक्ष 18 अरब डॉलर यानी 2.4 प्रतिशत पर पहुंच गया. विदेशी मुद्रा के कुल अंतर्प्रवाह और बहिप्रर्वाह के बीच के अंतर को कैड कहा जाता है.

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मास्टर स्ट्रोक : फुल एपिसोड । 12 राज्यों में दिखा भारत बंद का असर

Published at : 11 Sep 2018 08:55 AM (IST) Tags: FInance Ministry हिंदी समाचार, ब्रेकिंग न्यूज़ हिंदी में सबसे पहले पढ़ें abp News पर। सबसे विश्वसनीय हिंदी न्यूज़ वेबसाइट एबीपी न्यूज़ पर पढ़ें बॉलीवुड, खेल जगत, कोरोना Vaccine से जुड़ी ख़बरें। For more विदेशी मुद्रा में 6 नौकरियां related stories, follow: News in Hindi

देश का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ा, 641 अरब डॉलर पर पहुंचा आंकड़ा

देश का विदेशी मुद्रा भंडार 15 अक्टूबर को खत्म हुए हफ्ते में 1.492 अरब डॉलर बढ़कर 641.008 अरब डॉलर पर पहुंच गया है. 8 अक्टूबर को खत्म हुए इससे पिछले हफ्ते में भंडार में 2.039 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हुई थी.

देश का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ा, 641 अरब डॉलर पर पहुंचा आंकड़ा

देश का विदेशी मुद्रा भंडार 15 अक्टूबर को खत्म हुए हफ्ते में 1.492 अरब डॉलर बढ़कर 641.008 अरब डॉलर पर पहुंच गया है.

TV9 Bharatvarsh | Edited By: राघव वाधवा

Updated on: Oct 23, 2021 | 11:00 AM

Foreign Exchange reserves: देश का विदेशी मुद्रा भंडार 15 अक्टूबर को खत्म हुए हफ्ते में 1.492 अरब डॉलर बढ़कर 641.008 अरब डॉलर पर पहुंच गया है. RBI ने शुक्रवार को इस संबंध में डेटा जारी किया है. 8 अक्टूबर को खत्म हुए इससे पिछले हफ्ते में भंडार में 2.039 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हुई थी और यह 639.516 अरब डॉलर हो गया था. रिजर्व 3 सितंबर 2021 को खत्म विदेशी मुद्रा में 6 नौकरियां हुए हफ्ते में 642.453 अरब डॉलर की सर्वकालिक ऊंचाई पर आ गया था.

फॉरेन करेंसी एसेट्स में इजाफा वजह

15 अक्टूबर को खत्म हुए समीक्षाधीन हफ्ते में, विदेशी मुद्रा भंडार में बढ़ोतरी की मुख्य वजह फॉरेन करेंसी एसेट्स (FCAs) में इजाफा रहा, जो कुल रिजर्व का मुख्य हिस्सा है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा जारी साप्ताहिक डेटा के मुताबिक, FCAs 950 मिलियन डॉलर बढ़कर 577.951 अरब डॉलर पर पहुंच गए हैं.

डॉलर की टर्म में देखे जाने वाला, फॉरेन करेंसी एसेट्स में नॉन-यूएस यूनिट्स जैसे यूरो, पाउंड और येन में बढ़ोतरी या गिरावट का असर शामिल होता है, जो फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व में मौजूद हैं.

स्वर्ण भंडार में भी बढ़ोतरी

डेटा के मुताबिक, समीक्षाधीन हफ्ते में सोने का रिजर्व भी 557 मिलियन डॉलर की बढ़ोतरी के साथ 38.579 अरब डॉलर पर पहुंच गया. वहीं, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के पास मौजूद स्पेशल ड्राइंग राइट्स (SDRs) 21 मिलियन डॉलर की गिरावट के साथ 19.247 अरब डॉलर पर आ गए हैं. आईएमएफ के साथ देश की रिजर्व स्थिति 6 मिलियन डॉलर बढ़कर 5.231 अरब डॉलर पर पहुंच गई है.

आपको बता दें कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से कहा था कि भारत मजबूत आर्थिक पुनरुद्धार का अनुभव कर रहा है, और उसने अपनी मौद्रिक नीति में उदार बने रहने का फैसला किया है. आरबीआई के गवर्नर शक्तिकांत दास ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक की वार्षिक बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि भारत बहुत मजबूत आर्थिक सुधार देख रहा है, लेकिन अभी भी विभिन्न क्षेत्रों के बीच असमानता है. उनके भाषण के हिस्से को आईएमएफ ने जारी किया. इस वीडियो क्लिप में दास ने कहा कि इसलिए हमने अपनी मौद्रिक नीति विदेशी मुद्रा में 6 नौकरियां में उदार बने रहने का फैसला किया है, जबकि साथ ही मुद्रास्फीति के परिदृश्य पर बारीकी से नजर रखी जा रही है.

क्या धीरे धीरे सभी सरकारी नौकरियां कच्ची हो जाएंगी ?

4) ऊपरी अधिकारियों के हाथ में होगा करियर, की नौकरी पर रखना है या नहीं?

5) 5 साल बाद भी नौकरी तब मिलेगी जब बकायदा परीक्षा और इंटरव्यू में पास होंगे।

6) नौकरी पाने के लिए भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलेगा।

7) SC, ST, OBC के बीच में प्रतिस्पर्धा और जातिवाद बढ़ेगा।

8) आरक्षण व्यवस्था का ठीक से पालन कर पाना मुश्किल होगा।
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शिक्षा , इतिहास , अर्थशास्त्र, राजनीति और अन्य समसामयिक विषयों पर पत्रकार गिरिजेश वशिष्ठ के विश्लेषण इस चनल पर लगातार मिलता है. आजाद, खुली और स्वस्थ पत्रकारिता को अपने अनुभव से लेकर आते हैं.
ये चैनल पत्रकार गिरिजेश वशिष्ठ के विश्लेषणों का चैनल है. गिरिजेश वशिष्ठ वरिष्ठ पत्रकार हैं. वो इन्डिया टुडे ग्रुप, दिल्ली आजतक, ज़ी, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, सहारा समय समेत अनेक महत्वपूर्ण समाचार संस्थानों में संपादक के स्तर पर जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं और पिछले 34 साल से लगातार सक्रिय हैं.
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विदेशी मुद्रा में 6 नौकरियां

वर्ष 2000 के बाद के पहले दशक की सांझ ढल रही है। अगला दशक दस्तक दे रहा है।

सन 2001 में जॉर्ज डब्ल्यू. बुश के दुनिया के सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और सामरिक ताकत की कमान संभालने के बाद से लेकर अब बराक ओबामा के उदय तक बहुत कुछ बदल चुका है। बुश के पर्दे पर उभरने के समय जहां अमेरिका ही दुनिया के रंगमंच पर प्रमुख भूमिका में था, वहां अब ओबामा के दौर में चीन और भारत भी बेहद अहम भूमिका में नजर आने लगे हैं।

शीतयुध्द के बाद बनी एकध्रुवीय दुनिया ने भला ऐसी अंगड़ाई क्यों ली? इस सवाल के जवाब में कुछ लोग बुश की नीतियों को दोषी ठहराते हैं तो कुछ लोग चीन और भारत की नीतियों और प्रतिभाओं को इस चमत्कार का श्रेय देते हैं। छाछ भी फूंक-फूंक कर पीने की तर्ज पर खुद ओबामा दोनों ही कारणों का अपने भाषणों और नीतियों में उल्लेख करते नजर आ रहे हैं।

मगर एक बात पर तो शायद सभी एक मत हैं कि दुनिया की इस बदलती तस्वीर के पीछे का असल कलाकार तो आर्थिक मंदी ही है। इस दशक की शुरुआत में जहां सब कुछ हरा-हरा नजर आ रहा था, वहीं दबे पांव आई मंदी ने मानों सब कुछ उलट-पुलट कर दिया।

जाहिर है, ऐसे खतरनाक भूचाल के बाद अगर अमेरिका और यूरोप जैसे महारथी औंधे मुंह गिर पड़े हों और भारत फिर भी मतवाली चाल से चलता चला जा रहा हो तो फिर क्यों न दुनिया इस चमत्कार को नमस्कार करे।

औंधे मुंह गिरे अंकल सैम : इस चमत्कार को समझने के लिए जरा नजर डालिए सन 2000 के बाद से ही डगमगाते अंकल सैम की ओर। उसकी हालत इतनी खराब थी कि पिछले 10 साल में वहां सालाना 9 फीसदी की दर से आबादी बढ़ने के बावजूद निजी क्षेत्र ने नई नौकरियां लगभग न के बराबर दीं।

आंकड़ों के अनुसार, जून 1999 में निजी नौकरियां वहां 108.544 मिलियन थी तो सितंबर 2008 में भी कमोबेश इतनी ही नौकरियां उपलब्ध थीं। वहां का शेयर बाजार तो पिछले दशक में ढेरों बेलआउट पैकेजों और कर राहतों के बाद भी कोमा में ही पड़ा रहा। लिहाजा अमेरिकी निवेशकों ने इससे तौबा करने में ही अपनी भलाई समझी।

सन 2001 में जहां 57 प्रतिशत अमेरिकी लोगों के पास शेयर या बॉन्ड थे, वहीं 2008 में यह प्रतिशत घटकर 48 ही रह गया। वहां के लोगों की हाउसहोल्ड इनकम में ही सिर्फ गिरावट नहीं हुई बल्कि गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों का प्रतिशत 1999 के 11.9 से बढ़कर 2009 में 13.2 पर आ गया।

बुश के शासनकाल के अंत तक अमेरिकी राजस्व घाटा 1 ट्रिलियन डॉलर के रिकॉर्ड पर पहुंच चुका था और राष्ट्रीय ऋण भी इस दौरान 10.6 ट्रिलियन डॉलर की उछाल मार चुका था।

मतवाली चाल चलता रहा भारत : मंदी और महंगाई की बेड़ियों से दुनिया के आर्थिक धरातल पर भारत की मतवाली चाल सुस्त तो हुई मगर रुकी कतई नहीं। सन 2008 में मंदी के आने से पहले तो यह चाल अपने शबाब पर थी। सन 2006 में भारत की आर्थिक विकास दर 9.6 प्रतिशत थी तो 2007 में यह 9.2 फीसदी थी।

बाजार सुधार कार्यक्रमों के मंत्र से देश में बड़े पैमाने पर विदेशी मुद्रा आ रही थी, विदेशी मुद्रा भंडार भी लबालब था, आईटी और रियल एस्टेट आसमान पर थे तो शेयर बाजार में चकाचौंध थी। हालांकि फिर इस भारत के सामने कई कड़ी चुनौतियां भी आ गईं। रिजर्व बैंक के तय किए लक्ष्य 4 प्रतिशत की बजाय महंगाई एक समय में 11 प्रतिशत तक आ पहुंची।

कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय बाजार में दाम बेकाबू होने लगे और खाद्यान्न लोगों की पहुंच से बाहर होने लगा। वैश्विक मंदी के बुखार से शेयर बाजार भी ठंडा पड़ने लगा और जनवरी 2008 के रिकॉर्ड स्तर से लुढ़कते हुए महज छह महीनों में 40 फीसदी तक नीचे आ गया।

विकास दर भी गिर कर 2008-09 में 6.7 प्रतिशत पर आ गई। उसी दौरान 6 अरब डॉलर से ज्यादा विदेशी मुद्रा भी देश से बाहर निकल गई। मगर बाकी दुनिया के उलट देश इस झटके से भी उबर गया।

दशक के अंत में हम अगर अपनी विकास दर पर नजर डालें तो पता चलता है कि मई 2009 में भले ही यह गिरकर 5.8 प्रतिशत पर आ गई हो लेकिन 2009 की दूसरी तिमाही में यह तेजी से बढ़कर 7.9 प्रतिशत पर भी आ पहुंची। विशेषज्ञ मानने लगे हैं कि 2010 तक यह फिर 8 से 9 फीसदी की रफ्तार पकड़ लेगी।

वैसे अगर समूचे दशक की बात की जाए तो भी इस दौरान देश औसतन 7 फीसदी की विकास दर के रथ पर ही सवार रहा है। पिछले दो दशकों से तुलना करने पर पता चलता है कि यह दर उनके मुकाबले 1.5 प्रतिशत ज्यादा ही है।

औद्योगिक उत्पादन तो जून 2008 से जून 2009 के बीच बढ़कर 7.1 प्रतिशत हो गया। इसी दशक में भारत ने गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले कुल लोगों में 10 फीसदी की कमी भी कर ली है।

तप कर कुंदन बनने की है यह कहानी!

निर्यात से डूब जाती नैया : देश के डीजीपी में निर्यात की हिस्सेदारी महज 15 फीसदी ही है, जो कि चीन और जापान जैसे एशियाई देशों के मुकाबले भी आधी ही है। यह एक बड़ी वजह है कि दुनियाके बाकी देशों का बंटाधार भी उतना असर भारत पर नहीं डाल सका, जितना कि बाकियों पर पड़ा।

बैंकिंग जगत बना बंकर : देश के बैंकिंग जगत पर कुछ हद तक कसी सरकारी नकेल ने इसे मंदी के आक्रमण से बचने के लिए मानों बंकर सरीखा बना दिया। न्यू यॉर्क टाइम्स ने तो अपने संपादकीय में ही भारतीय बैंकिंग जगत के लिए बने कड़े सरकारी नियमों की प्रशंसा करते हुए लिखा कि इस सबप्राइम मोर्टगेज संकट के असर से इसे लगभग अछूता ही बना दिया।

मांग ने बनाया पहलवान : विदेशों के आर्थिक विशेषज्ञों ने जब मंदी से बच निकलने के भारतीय हुनर की पड़ताल की तो उन्हें पता चला कि यहां रहने वाली जोरदार घरेलू मांग ने मंदी को पैर जमाने ही नहीं दिया। इसके अलावा, इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट ने भी मंदी के पांव उखाड़ने में काफी मदद की।

आईटी की जुगत काम आई : अमेरिका के धराशाई होने से पहले ही मानों देश के आईटी और अन्य सेक्टरों ने मंदी की आहट भांप ली थी। वक्त रहते ही अमेरिका के बाजार पर निर्भरता छोड़कर यूरोप और अन्य देशों के बाजारों की ओर रुख करना भी भारत के लिए बेहद अच्छा साबित हुआ।

सरकार ने भी दिया खून : जब भारतीय शेयर बाजार से एफआईआई ने सितंबर 2008 से मार्च 2009 के बीच लगभग 33 हजार करोड़ रुपये निकाल कर झटका दिया तो रिजर्व बैंक ने 1,49,746 करोड़ रुपये की बिक्री करके रुपये की गिरावट पर ब्रेकर लगाया।

इसके अलावा, हजारों करोड़ रुपये झोंक कर बाजार में तरलता भी बनाए रखी। करों और दरों में कटौती करके मांग की रफ्तार को बनाए रखने की सरकारी जुगत भी काफी काम आई।

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